असामाजिक होने की टीस के अहसास
हे मेरे विभिन्न श्रेणियों के सोशल मीडियाई मित्रो! आपको यह जानकर हार्दिक दुख होगा कि कल से मैं व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम, फेसबुक के ग्रुपों से कार्यभार मुक्त हो रहा हूं। मेरे कार्यभार मुक्त होने के पीछे किसी भी तरह की कोई सोशल मीडियाई सार्वजनिक वजह नहीं है। इसलिए मेरे मित्र इसे अन्यथा न लें।
असल में सोशल मीडियाई ग्रुपों से मुक्त होने का कारण यह है कि मेरे इन ग्रुपों पर इतने अधिक आभासी मित्र हो गए थे कि उनको अब हैंडल करना मेरे बस से बाहर हो रहा था। उनके चलते मैं अपने घर के सदस्यों से अलग होने लगा था। अपने घर के सदस्यों से अब मुझे बातें करना मेरे लिए भार लगने लगा था।
भद्रो! अब आपसे झूठ क्या बोलना, क्यों बोलना जबकि आज का दौर झूठ फरेब का दौर है। असल में मैं अब अपने को ही नहीं संभाल पा रहा हूं तो व्हाट्सएप के वीरों को कैसे संभालूं?
भद्रो! अब आप ही बताइए, आखिर कोई कितनी देर तक लगातार इन ग्रुपों की पोस्टों पर अपनी आंखें गड़ाए रख सकता है भला? इन ग्रुपों का मेरे दिमाग पर साइड इफेक्ट होने के बाद अब मेरी आंखों पर भी साइड इफेक्ट होने लगा है। मैं देखना कुछ चाहता हूं तो मेरी आंखें मुझे दिखाती कुछ और हैं। मैं पढऩा कुछ और चाहता हूं तो मेरी आंखें मुझे पढ़वातीं कुछ और हैं। इसलिए अपनी आंखों के हित में अब मैं तमाम तरह के सोशल मीडिया ग्रुपों से अपने को अलग कर रहा हूं।
भद्रो! यद्यपि मुझे अपने तमाम ग्रुपों से अपने को अलग करते हुए असहनीय दुख की प्रतीति हो रही है, जिसकी उच्च से उच्चकोटि का दुखियारा कल्पना भी नहीं कर सकता। मुझे इस वक्त इतना दुख हो रहा है कि इतना तो आत्मा को शरीर से अलग होते हुए भी दुख न होता होगा। मुझे इस वक्त इतना दुख हो रहा है कि इतना तो रीतिकालीन प्रेमी-प्रेमिका को एक-दूसरे से अलग होते हुए भी न होता होगा। मुझे इस वक्त इतना दुख हो रहा है कि इतना तो सारी नौकरी रिश्वत वाली सीट पर बैठे सदाचारी को अपनी सेवानिवृत्ति पर भी नहीं होता होगा। मैं अपने इस दुख को शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता। मेरा यह दुख शब्दातीत है।
सोशल मीडिया पर रहते हुए मैं अपने दिमाग की समस्या से तो न बच सका, पर अब मेरे पास अपनी आंखों की समस्या से बचने का एकमात्र यही तरीका बचा है। शेष आंखें बची रहें तो ग्रुप से बाहर भी कुछ देख सकूंगा।
