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उत्तराखण्ड का पारम्परिक भोजन भूख मिटाने के साथ औषधी का भी करता है कामः द्वारिका प्रसाद

देहरादून

उत्तराखंड के पारंपरिक भोजन को पूरे देश में गढ़भोज के नाम से पहचान दिला कर थाली का हिस्सा व आर्थिकी का जरिया बनाने के लिये हिमालय पर्यावरण जड़ी बुटी एग्रो संस्थान जाड़ी वर्ष 2000 से राज्य में गढ़भोज अभियान चला रहा है। आज परेड ग्राउंड स्थित उत्तरांचल प्रेस क्लब में पत्रकारों से वार्ता करते हुए गढ़भोज अभियान के प्रणेता द्वारिका प्रसाद सेमवाल ने कहा कि असल मे उत्तराखण्ड का पारम्परिक भोजन दुनिया के चुनिंदा भोजन मे से है जो भूख मिटाने के साथ साथ औषधी का काम भी करते हैं। उन्होंने कहा कि पहाड़ की फसले पारिस्थितकी तंत्र मे संतुलन बनाये रखने मे भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्यवश यह फसलें व उनसे बनने वाले भोजन कुछ वर्ष पूर्व हासिये पर चले गये थे। जो फिर आज धीरे-धीरे हमारी थाली का हिस्सा बन रही है। उन्होंने कहा कि गढ़ भोज अभियान के लम्बे संघर्ष व सरकारों के प्रयासों से आज धीरे-धीरे फसलों के उत्पादन बढाने की कोशिश व बेहतर बाजार व्यवस्था के प्रयास जारी है। उन्होंने कहा कि जिसे सब को मिलकर और बेहतर करने की जरुरत है। उत्तराखंड के पारम्परिक फसले व उससे बनने वाले गढ़भोज की खूबिया व सरक्षण को लेकर राज्यवासी सम्पूर्ण राज्य व राज्य से बाहर एक दिन उत्सव के रूप मे मनाये इसके लिये जाड़ी संस्थान के द्वारा 7 अक्टूबर 2022 को गढ़ भोज दिवस मनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि प्रथम गढ़ भोज दिवस का शुभारंभ प्रदेश के शिक्षा व स्वास्थ्य मंत्री डा. धन सिंह रावत करेंगे। उन्होंने कहा कि राज्य भर मे मनाया जायेगा गढ़ भोज दिवस। गढ़भोज अभियान के प्रणेता द्वारिका प्रसाद सेमवाल ने कहा की गढ़ भोज दिवस के अवसर पर उत्तराखंड के दो दर्जन से अधिक स्वस्थ, भोजन के विशेषज्ञो द्वारा स्कूली पाठ्यक्रम के लिये तैयार की गई पुस्तक का विमोचन किया जायेगा। उन्होंने कहा कि गढ़ भोज दिवस पर राज्य के स्कूल मे मिड दे मिल (प्रधानमंत्री पोषण) योजना मे गढ़ भोज शामिल होगा। जिसकी पहली थाली मंत्री बच्चों को परोसेंगे। इस अवसर पर डा. अरविन्द दरमोडा ने कहा की गढ़ भोज अभियान दुनिया का एक मात्र अभियान है जो फसलों व भोजन को पहचान दिलाने के लिये चलाया गया है। जो सफल भी हुआ। हम सबका दायित्व बनता है की उत्तराखण्ड की भोजन संस्कृति, विरासत को लोग जाने इस लिये गढ़ भोज दिवस मनाने का निर्णय लिया गया। इस अवसर पर प्रो.यतीश वशिष्ठ ने कहा कि उत्तराखण्ड के पारम्परिक भोजन गढ़ भोज की विषेशताओं को ज्यादा से ज्यादा लोग जाने व इसको राज्य व राष्टीय स्तर पर
गढ़भोज उत्सव मनाने के लिये गढ भोज दिवस की कल्पना की गई। इस अवसर पर आदि शामिल रहे।